Sunday, 30 October 2011

आखिर हम तुम क्यों लिखते हैं ?

आखिर हम तुम क्यों लिखते हैं ?

महंगा बिकने की खातिर ?

अलग सा दिखने की खातिर ?

वाह वाह ,वाह वाह पाने को?

कोई दिल धड़काने को ?

आखिर हम तुम क्यों लिखते हैं ?

-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०--०--०-

चौकी दारा करने को ?,

धारा के उलट चलने को ?

इन्कलाब सा लाने को ?

पद प्रतिष्ठा पाने को?

आखिर हम तुम क्यों लिखते हैं ?

-०-०-०-०-०-००-०--०--०-०-०-

अख़बारों में छपने को ?

दरबारों में घुसने को?

या फिर ईनामों की खातिर ;

ये जोड़ तोड़ तिकडम जी भर .

आखिर हम तुम क्यों लिखते हैं ?

-०-०-०-०-०-०-०-०-०-००-०

या दिल की दुनिया का  हाकम;

दिल करता है हम पर शासन.

उसका हर हुकुम बजाने को

लिखते हैं हम जी जाने को?

आखिर हम तुम क्यों लिखते हैं ?

-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-

दीप जीरवी

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